
अंधकार में जन्मी वो शक्ति, जिनके सामने विष्णु का उग्रतम रूप और शिव का उग्रतम रूप भी शांत हो गए। जानिए प्रत्यंगिरा देवी की उत्पत्ति, अथर्ववेद से संबंध और महाकृत्या रूप की पूरी कथा।
🔱 पूरी कथा पढ़ेंकथा-वाचन: गौरव राज गुप्ता | Dharm Manch
माँ प्रत्यंगिरा देवी की वह उग्र शक्ति हैं, जिन्हें शत्रु द्वारा चलाए गए अस्त्र-मंत्रों, आत्मिक आक्रमणों और नकारात्मक प्रहारों को पलटकर वापस भेजने वाली माना जाता है। परंपरा के अनुसार ऋषि अंगिरा और ऋषि प्रत्यंगिरस के सम्मान में उनका नाम प्रत्यंगिरा पड़ा। उन्हें अथर्व देवी प्रत्यंगिरा और निकुंभला भद्रकाली भी कहा जाता है।
बहुत पुरानी बात है। दो ऋषि थे, ऋषि अंगिरा और ऋषि प्रत्यंगिरस। दोनों के मन में एक ही ज़िद थी: देवी का ऐसा रूप खोजना, जो इतना उग्र और प्रचंड हो कि दुनिया की हर नकारात्मक शक्ति उसके सामने टिक न सके। उनके ध्यान के केंद्र में थीं माँ ललिता महात्रिपुरसुंदरी।
साँसें धीमी होती गईं। पहले पंछी चुप हुए, फिर हवा, फिर समय। भीतर उतरते-उतरते वे ऐसी जगह पहुँचे, जहाँ घोर अंधकार था। शास्त्र इसे तमस कहते हैं, इतना गाढ़ा कि जैसे अंधेरा कोई ठोस वस्तु हो। एक ऋषि दूसरे का हाथ भी नहीं देख पा रहे थे।
तभी उस अंधेरे के बीच कुछ हिला। एक विशाल उपस्थिति, एक शक्ति, जिसके सामने अंधकार भी छोटा लग रहा था। ऋषियों ने हाथ जोड़कर पूछा, "माँ, आप कौन हैं? आपका नाम क्या है?"
एक मान्यता है कि माँ ने प्रसन्न होकर ऋषियों को अमरता का आशीर्वाद दिया और अपने भक्तों का मान रखने के लिए उनका नाम अपना लिया। यानी जो शक्ति सबको नाम देती है, उसने अपने भक्तों से नाम लिया।
एक दूसरी परंपरा के अनुसार दोनों ऋषियों ने हिमालय में बारह वर्षों तक कठोर तपस्या की। कुछ ग्रंथ-परंपराएँ इसे बारह कल्पों की तपस्या बताती हैं। बर्फ़ीली हवा और पत्थर जैसी ठंड के बीच वे हिले तक नहीं।
फिर एक दिन आकाश में प्रकाश फूटा और देवी प्रकट हुईं, हज़ार मुख और हज़ार नेत्रों वाले विराट रूप में। माँ ने कहा, "पुत्रो, आज से मेरा ये रूप तुम्हारे नाम से जाना जाएगा।" इस रूप को अथर्व देवी प्रत्यंगिरा कहा गया, और इसी रूप को निकुंभला भद्रकाली भी कहा जाता है।
कथाएँ दो हैं, एक में ध्यान का अंधकार और दूसरी में हिमालय की तपस्या, लेकिन बात एक है: जो नामहीन थीं, उन्हें नाम उनके भक्तों ने दिया।
इस अर्थ के पीछे कथा का सबसे गहरा रहस्य छिपा है, जिस तक हम इस श्रृंखला के तीसरे भाग में पहुँचेंगे।
अथर्ववेद को पहले कहीं-कहीं "अथर्वांगिरस वेद" कहा जाता था, यानी ऋषि अथर्वा और ऋषि अंगिरा, दोनों की विद्याओं का संगम। आगे चलकर यह पहले के तीन वेदों में जुड़कर चौथा वेद कहलाया। इसका गहरा संबंध प्रयोगों, तंत्र और उन विद्याओं से माना जाता है जिनसे बुरी शक्तियों को रोका जाता था।
अथर्ववेद से जुड़े कुछ ग्रंथों में माँ का एक अत्यंत विकराल रूप मिलता है: दो हज़ार भुजाएँ, और हर भुजा में एक भयंकर शस्त्र। इस रूप को महाकृत्या कहा गया, यानी शत्रु के चलाए अस्त्र-मंत्रों और आत्मिक आक्रमणों को नष्ट करने वाली महाशक्ति।
उस काल में यह विद्या राजाओं और बड़े शक्तिशाली लोगों के लिए थी, ताकि पूरे राज्य, पूरे वंश और पूरे समुदाय की रक्षा हो सके।